नवरात्र में मीट-मछली की दुकानें बंद, ईद पर भी नहीं खुलीं – सरकार का दोहरा रवैया?

नीरज सिंह, वाराणसी
वाराणसी में नवरात्र के चलते प्रशासन ने पूरे जिले में मीट-मांस और मछली की दुकानों को बंद रखने का आदेश जारी किया, जिसे प्रभावी ढंग से लागू भी कर दिया गया। यह निर्णय तब लिया गया जब मुस्लिम समुदाय का प्रमुख त्योहार ईद भी मनाया जा रहा था। बावजूद इसके, मुसलमानों ने किसी प्रकार का विरोध नहीं किया, हालांकि त्योहार उनका भी था।
प्रशासन का यह निर्णय सवाल खड़ा करता है कि क्या सरकार सिर्फ बहुसंख्यक वर्ग की धार्मिक भावनाओं का ही सम्मान करती है? यदि धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखते हुए ऐसे आदेश दिए जाते हैं, तो मीट-मांस की दुकानें केवल उन स्थानों पर बंद की जानी चाहिए थीं, जहां 500 मीटर की परिधि में कोई प्रतिष्ठित देवी मंदिर स्थित हो। मगर इसके बजाय पूरे जिले में इस व्यवसाय पर रोक लगा दी गई, जिससे हिंदू और मुस्लिम, दोनों ही धर्मों के गरीब तबके के लोग प्रभावित हुए, जिनकी आजीविका इसी पर निर्भर थी।
इतना ही नहीं, जिले में अंडे बेचने वाले रेहड़ी-ठेले वालों ने भी नौ दिनों के लिए अपना धंधा बंद कर दिया या करवा दिया गया, यह स्पष्ट नहीं है। ऐसे हालात में रोज कमाने-खाने वाले गरीब तबके के लोग संकट में पड़ गए, लेकिन प्रशासन को उनकी परवाह नहीं दिखी।
विरोधाभास यह भी है कि जहां मीट की बिक्री नवरात्रि के नाम पर पूरी तरह रोक दी गई, वहीं कई देवी मंदिरों में बकरे की बलि की परंपरा निर्बाध रूप से जारी रही। बलि चढ़ाए गए बकरे का मांस प्रसाद के रूप में वितरित भी किया गया। सवाल उठता है कि यदि धार्मिक शुचिता के नाम पर मीट की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया गया, तो बलि प्रथा को भी रोका जाना चाहिए था।
इसके अलावा, तामसिक आहार के नाम पर मांस और अंडे की बिक्री पर रोक लगाई गई, तो शराब पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया गया? शराब भी तामसिक प्रवृत्ति में आती है, लेकिन इससे सरकार को भारी राजस्व प्राप्त होता है। बड़े व्यवसायी, खासकर बहुसंख्यक समुदाय से जुड़े लोग, शराब के व्यापार में संलग्न हैं, इसलिए सरकार इस पर प्रतिबंध लगाने की हिम्मत नहीं जुटा पाती।
यह सब सरकार के दोहरे रवैये की ओर इशारा करता है। धार्मिकता और सात्विकता के नाम पर नियम बनाए जाते हैं, मगर जब बात राजस्व और बड़े व्यापारियों के हितों की आती है, तो वही सरकार चुप्पी साध लेती है। पत्रकार भी अब ऐसे मुद्दों पर सवाल उठाने से बचने लगे हैं, क्योंकि सवाल उठाते ही उन पर अनर्गल आरोप लगाए जाने लगते हैं।




