रामनगर रामलीला: नवें दिन वनवास प्रारंभ, श्री राम, सीता और लक्ष्मण की मार्मिक कथा से भक्त हुए भावविभोर
ख़बर भारत डेस्क

रामनगर, 15 सितंबर 2025: विश्वविख्यात रामनगर रामलीला के नवें दिन भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण के वनवास प्रारंभ होने का भावपूर्ण प्रसंग प्रस्तुत किया गया। यह आयोजन भक्तों के लिए आस्था, भक्ति और श्रद्धा का एक अनुपम संगम बन गया। रामचरितमानस के इस दृश्य ने अयोध्या के त्याग, प्रेम और कर्तव्य की भावना को जीवंत कर दिया, जिसने हजारों श्रद्धालुओं के हृदय को छू लिया।
माता कौशल्या का विलाप और सीता की दृढ़ता
रामलीला के इस प्रसंग की शुरुआत माता कौशल्या के रनिवास से हुई, जहां वे अपने पुत्र श्री राम को वनवास के लिए विदा करते समय भावुक हो उठीं। माता कौशल्या ने दुखी मन से कहा, “हे राम! यह सब विधाता की इच्छा है। जो हो रहा है और जो होगा, वह सब विधाता के अधीन है।” दूसरी ओर, माता सीता ने श्री राम के साथ वन जाने का दृढ़ संकल्प लिया। उन्होंने कहा, “मेरे पति जहां हैं, वही मेरा संसार है। मैं आपके बिना कहीं नहीं रह सकती।” माता कौशल्या और श्री राम के समझाने के बावजूद सीता अपने निर्णय पर अडिग रहीं। अंततः श्री राम ने माता की आज्ञा ली और सीता के साथ वन की ओर प्रस्थान करने को तैयार हुए।

लक्ष्मण का प्रेम और माता सुमित्रा का त्याग
इसी बीच, लक्ष्मण दौड़कर आए और श्री राम के साथ वन जाने की जिद करने लगे। भावुक होकर उन्होंने कहा, “हे रघुनाथ! मैं आपका दास हूं। मुझे त्यागिए मत। मेरे लिए माता, पिता, गुरु सब आप ही हैं।” श्री राम ने लक्ष्मण के प्रेम को देखकर उन्हें माता सुमित्रा से विदाई लेने को कहा। माता सुमित्रा ने दुखी मन से लक्ष्मण को आशीर्वाद देते हुए कहा, “जहां सिया-राम हैं, वही तुम्हारी अयोध्या है। तुम्हारा यहां कोई काम नहीं।” लक्ष्मण ने माता का आशीर्वाद लिया और श्री राम व सीता के साथ महाराज दशरथ से अंतिम विदाई लेने पहुंचे।
दशरथ का शोक और अयोध्यावासियों का विलाप
महाराज दशरथ श्री राम, सीता और लक्ष्मण को वन जाते देख अचेत हो गए। उन्होंने सीता को रोकने का प्रयास किया, लेकिन सीता और लक्ष्मण दोनों ही श्री राम के साथ जाने के लिए दृढ़ थे। अंततः तीनों ने मुनिवेश धारण किया और गुरु वशिष्ठ से आशीर्वाद लेकर वन की ओर प्रस्थान किया। दशरथ ने अपने विश्वासपात्र मंत्री सुमंत को रथ के साथ भेजा, ताकि वे कुछ दिन वन दिखाकर तीनों को वापस ला सकें।
अयोध्यावासी श्री राम के पीछे-पीछे रोते-बिलखते चल पड़े। सरयू नदी के तट पर पहुंचकर श्री राम ने सुमंत से रात के अंधेरे में रथ इस तरह चलाने को कहा कि पहिए के निशान न दिखें। सुबह जब अयोध्यावासी जागे, तो श्री राम, सीता और लक्ष्मण जा चुके थे। रोते-बिलखते हुए अयोध्यावासी वापस लौट गए।
श्रृंगवेरपुर में निषादराज से मुलाकात
श्रृंगवेरपुर पहुंचकर श्री राम अपने सखा निषादराज से मिले। निषादराज ने उनका भव्य स्वागत किया और उन्हें नगर में ले जाना चाहा, लेकिन श्री राम ने सिंसुपा वृक्ष के नीचे रुकना पसंद किया। रात में लक्ष्मण ने पहरेदारी की, जबकि श्री राम और सीता कुश पर विश्राम करने लगे। यह दृश्य देख निषादराज भावविभोर हो उठे और बोले, “इतना ऐश्वर्य व्यर्थ है, जब श्री राम और सीता कुश पर सो रहे हैं। यह सब कैकेई की करनी है।”
लक्ष्मण ने निषादराज को समझाते हुए तुलसीदास जी की चौपाई का गीता-समान उपदेश दिया:
“काहु न कोउ सुख दु:ख कर दाता। निज कृत करम भोग सबु भ्राता॥”
अर्थात, कोई किसी को सुख-दुख नहीं देता, सभी अपने कर्मों का फल भोगते हैं। उन्होंने कहा, “यह संसार माया और स्वप्न के समान है। क्रोध या दोष न करें, यह परमपिता परमेश्वर की लीला है। सिया-राम के चरणों में प्रीति रखें।”
भक्ति और श्रद्धा से भरा समापन
रामलीला के इस प्रसंग का समापन निषादराज द्वारा श्री राम की मनोरम आरती के साथ हुआ। हजारों भक्तों ने “जय जय श्री सीता राम”, “हर हर महादेव”, “बजरंग बली महाराज की जय” और “संत श्री गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज की जय” के जयघोष के साथ भक्ति में डूबकर कथा का आनंद लिया। मंच पर यह दृश्य इतना जीवंत था कि श्रोता भाव-विभोर हो उठे।
रामनगर रामलीला की विशेषता
रामनगर की रामलीला अपनी प्राचीन परंपरा और भव्यता के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। यह न केवल एक धार्मिक आयोजन है, बल्कि भारतीय संस्कृति और रामचरितमानस के मूल्यों को जीवंत करने का एक सशक्त माध्यम भी है। संत श्री काष्ठ जिह्वा स्वामी जी महाराज के आशीर्वाद से यह आयोजन हर वर्ष लाखों भक्तों को आकर्षित करता है।
संत श्री काष्ठ जिह्वा स्वामी जी महाराज की जय!
रामनगर रामलीला का यह नवां दिन भक्तों के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव रहा, जो श्री राम, सीता और लक्ष्मण के त्याग, प्रेम और कर्तव्य की भावना को हृदय में संजोए हुए घर लौटे।




