सैदपुर तहसील परिसर में माँ काली का ऐतिहासिक मंदिर, साधो मिस्त्री और पंडित रघुनाथ द्विवेदी की आस्था से जुड़ी है कथा
आकाश पाण्डेय, गाज़ीपुर

गाजीपुर। कहते हैं कि माँ की महिमा अपरंपार है और उनकी इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता। ऐसा ही एक चमत्कार सन् 1830 में सैदपुर तहसील परिसर में घटित हुआ, जब ब्रिटिश शासन अपने चरम पर था। इस मंदिर की स्थापना और इतिहास आज भी भक्तों के बीच आस्था और श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है।
साधो मिस्त्री और माँ की प्रतिमा की अद्भुत कहानी
जानकारी के अनुसार, उस समय तहसील परिसर में एक निर्माण कार्य चल रहा था। इसी दौरान साधो मिस्त्री नामक कारीगर ने पत्थर से माँ की प्रतिमा बनाई। अंग्रेजों के डर से साधो मिस्त्री ने उस प्रतिमा को गंगा नदी में प्रवाहित कर दिया।
पंडित रघुनाथ द्विवेदी को स्वप्न में माँ का आशीर्वाद
कुछ समय बाद संगत घाट पर रहने वाले पंडित रघुनाथ द्विवेदी को स्वप्न में माँ ने दर्शन दिए और कहा कि गंगा में घाट के किनारे उनकी प्रतिमा मौजूद है। इसके बाद पंडित जी ने प्रतिमा को गंगा से निकालकर संगत घाट स्थित ठाकुरबाड़ी में स्थापित कर दिया।
माँ की दूसरी आज्ञा और तहसील परिसर में स्थापना
इतना ही नहीं, बाद में माँ ने पुनः पंडित जी को दर्शन दिए और कहा कि उनकी वास्तविक स्थापना तहसील परिसर के नीम के पेड़ के पास की जाए। माँ की आज्ञा का पालन करते हुए पंडित जी ने प्रतिमा को वहीं स्थापित कर दिया। तब से लेकर आज तक उसी स्थान पर भक्तगण माँ की विधिवत पूजा-अर्चना करते आ रहे हैं।
आज भी गूँज रही है आस्था की ध्वनि
वर्तमान समय में इस मंदिर की देखरेख और पूजा-अर्चना का दायित्व पंडित सूर्यकांत मिश्र निभा रहे हैं। हर साल नवरात्रि और विशेष अवसरों पर यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। यह मंदिर अब न केवल स्थानीय लोगों की आस्था का केंद्र है, बल्कि पूरे क्षेत्र में श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक बन चुका है।




