Ghazipur

साधारण-सी दुकान, पिता का संघर्ष और शिक्षा ने मेरे लिए पूरी दुनिया खोल दी।” – आईएएस रामेश्वर सुधाकर सब्बनवाड़ की संघर्ष भरी कहानी

✒️ आकाश पाण्डेय || ख़बर भारत

साधारण-सी दुकान, पिता का संघर्ष और शिक्षा ने मेरे लिए पूरी दुनिया खोल दी।” – आईएएस रामेश्वर सुधाकर सब्बनवाड़ की संघर्ष भरी कहानी

 

गाजीपुर जिले का सैदपुर तहसील, जहां गंगा की लहरें धीरे-धीरे बहती हैं और किसानों की मेहनत की कहानियां हवा में तैरती रहती हैं। यहाँ की धरती हमेशा से ही संघर्ष और उम्मीदों का मेल रही है। लेकिन 2021 के अंत में, जब ठंडी हवाओं के साथ एक नया नाम आया—रामेश्वर सुधाकर सब्बनवाड़—तो सैदपुर ने एक नई सांस ली।

रामेश्वर, 2021 बैच के प्रशिक्षु आईएएस अधिकारी, को जिले में पहली तैनाती मिली थी। ज्वाइंट मजिस्ट्रेट के रूप में सैदपुर तहसील में कदम रखते ही उन्होंने न सिर्फ अपनी कुर्सी संभाली, बल्कि लोगों के दिलों में भी जगह बना ली।

आईएएस रामेश्वर सुधाकर सब्बनवाड़

रामेश्वर की कहानी किसी फिल्मी हीरो की तरह नहीं है— कोई चमकदार बैकग्राउंड या ड्रामेटिक एंट्री नहीं। महाराष्ट्र के लातूर जिले की उदगीर तहसील के छोटे से हंडारगुली गांव के निवासी, वे एक दुकानदार के बेटे हैं। उनके पिता एक साधारण किराना दुकान चलाते हैं, जबकि माँ गृहिणी हैं।

AI generated image
AI generated image
AI generated image
AI generated image

रामेश्वर ने अपनी स्कूली शिक्षा लातूर के जवाहर नवोदय विद्यालय से पूरी की और इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री पुणे से हासिल की। संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की सिविल सेवा परीक्षा 2021 में उन्होंने सोमवार को घोषित परिणामों में 202वीं रैंक प्राप्त की—और यह उपलब्धि उनके दूसरे प्रयास में ही आ गई।

AI generated image

वे एक साधारण परिवार से हैं, जहाँ शिक्षा और सेवा की परंपरा चली आ रही है। आईएएस बनने का सफर उनके लिए कठिन परीक्षा था, लेकिन सफलता मिलते ही उन्होंने ठान लिया था कि प्रशासन सिर्फ फाइलों का खेल नहीं, बल्कि लोगों की जिंदगी बदलने का माध्यम है। सैदपुर पहुँचते ही उन्होंने कहा, “सभी कार्य नियमों के अनुरूप होंगे, लेकिन न्याय सबका होगा।” यह वादा खोखला नहीं रहा।

एक दिन, तहसील कार्यालय में हलचल मच गई। एक महिला किसान, मोंथा गाँव से, रोते हुए पहुँची। उसकी फसल चौपट हो चुकी थी, और लेखपाल ने उसकी शिकायत को ठंडे बस्ते में डाल दिया था। रामेश्वर ने फौरन सुना। सिर्फ सुनना ही नहीं, उन्होंने तुरंत संबंधित लेखपाल को निलंबित कर दिया और तहसीलदार व नायब तहसीलदार को नोटिस जारी कर दिया। यह घटना सैदपुर के किसानों के बीच चर्चा का विषय बन गई। “नया एसडीएम आया है, जो फाइलों से ऊपर उठकर इंसानियत देखता है,” गाँव वालों ने कहा। रामेश्वर का यह फैसला न सिर्फ एक किसान की मदद कर गया, बल्कि पूरे तहसील में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक संदेश दे गया।

AI generated image

लेकिन रामेश्वर की कहानी सिर्फ सजा देने तक सीमित नहीं। वे बच्चों के भविष्य को भी जोड़ते हैं। अक्टूबर 2025 में, मिशन शक्ति के फेज 5.0 के तहत एक अनोखी पहल हुई। मिर्जापुर के प्राथमिक विद्यालय की कक्षा पाँचवीं की छात्रा सौम्या यादव को एक दिन के लिए एसडीएम बनाया गया। सौम्या, एक साधारण लड़की, जो सपनों में बड़ा बनने की कल्पना करती थी, तहसील पहुँची। रामेश्वर ने मुस्कुराते हुए अपनी कुर्सी सौंप दी। “आज तुम्हारा राज है, सौम्या। सीखो, कैसे एक अधिकारी फैसले लेता है,” उन्होंने कहा। सौम्या ने कार्यालय का दौरा किया, अधिकारियों से सवाल किए, और यह अनुभव न सिर्फ उसके लिए प्रेरणा बना, बल्कि सैदपुर की सैकड़ों लड़कियों को बताया कि प्रशासन उनके लिए भी खुला है। रामेश्वर ने इस मौके पर कहा, “महिलाओं को सशक्त बनाना मेरा मिशन है। एक दिन की एसडीएम से वे जीवन भर की नेता बनेंगी।”

और हाल ही में, नवंबर 2025 के चुनावी भ्रमण के दौरान, रामेश्वर की अपनी जड़ें फिर से सामने आईं। जब वे सैदपुर के एक छोटे से गाँव पहुँचे, तो वहीं की एक साधारण-सी किराना दुकान ने उनके भीतर वर्षों पुरानी स्मृतियों का सागर जगा दिया। ठीक ऐसी ही दुकान पर वे अपने पिता के साथ बैठकर पढ़ाई करते थे—बीच-बीच में ग्राहकों को संभालते हुए, जीवन को समझते हुए। उनके पिता सुबह से रात तक बिना थके परिश्रम करते थे। उनका अनुशासन, उनका समर्पण और उनके मौन त्याग रामेश्वर के जीवन की सबसे मजबूत नींव बने।

वहाँ खड़े होकर रामेश्वर को एहसास हुआ कि उनके सपनों की उड़ान इन्हीं विनम्र प्रारंभों से शुरू हुई थी। आज वे जो भी हैं—एक आईएएस अधिकारी के रूप में जो जिम्मेदारी उनके कंधों पर है—उसकी जड़ें उसी छोटी दुकान और उनके पिता के उस अटूट विश्वास में हैं कि शिक्षा ही जीवन का सबसे बड़ा वरदान है। शिक्षा ही वह शक्ति है जो परिस्थितियाँ बदल देती है, परिवारों को उभार देती है और हमारे लिए अनगिनत द्वार खोल देती है।

वह दुकान उन्हें यह भी याद दिला गई कि सफलता कभी अकेले की नहीं होती; उसके पीछे किसी का संघर्ष, किसी की आशा और किसी का निस्वार्थ प्रेम होता है। दिल से उन्होंने सबको बताया: “साधारण-सी दुकान, पिता का संघर्ष—और शिक्षा ने मेरे लिए पूरी दुनिया खोल दी।” यह अनुभव रामेश्वर को और मजबूत बनाता है, क्योंकि सैदपुर के गांवों में वे अब न सिर्फ अधिकारी हैं, बल्कि उन सैकड़ों बच्चों के लिए प्रेरणा, जो अपनी छोटी दुकानों या खेतों से बड़े सपने देखते हैं।

आज, नवंबर 2025 में, सैदपुर बदला-बदला सा लगता है। रामेश्वर की तैनाती के बाद ज्वाइंट मजिस्ट्रेट के रूप में नई जान फूँक दी गई है। बिजली चोरी की जाँच से लेकर गोशाला सुधार तक, हर मोर्चे पर सक्रियता दिखी। लेकिन सबसे बड़ी बात, वे लोगों से जुड़े रहते हैं—चाहे महायज्ञ में भाग लेकर सेना को समर्पित हों या किसानों की फरियाद सुनकर। रामेश्वर सुधाकर सब्बनवाड़ की यह कहानी सैदपुर की मिट्टी में रची-बसी है: एक अधिकारी की, जो नियमों का पालन करता है, लेकिन इंसानियत को कभी नहीं भूलता। शायद यही वजह है कि सैदपुर अब सिर्फ एक तहसील नहीं, बल्कि उम्मीदों का केंद्र बन गया है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button