SIR में उलझा सत्ता का गणित: वोटर लिस्ट से लेकर पार्टी के भीतर तक मचा बवाल
मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण ने यूपी की राजनीति में खड़ा किया तूफान, विपक्ष से ज्यादा सत्ता पक्ष के भीतर गहराया असंतोष

नीरज सिंह
● SIR में उलझा सत्ता का गणित: वोटर लिस्ट से लेकर पार्टी के भीतर तक मचा बवाल
● मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण ने यूपी की राजनीति में खड़ा किया तूफान, विपक्ष से ज्यादा सत्ता पक्ष के भीतर गहराया असंतोष
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस समय सबसे बड़ा सवाल किसी कानून, योजना या चुनावी वादे को लेकर नहीं, बल्कि लोकतंत्र की बुनियाद माने जाने वाले मतदाता सूची को लेकर खड़ा हो गया है। चुनाव आयोग द्वारा कराए जा रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) ने भारतीय जनता पार्टी की 2027 विधानसभा चुनाव की रणनीति को अंदर तक झकझोर दिया है। ड्राफ्ट मतदाता सूची में प्रदेश से करीब 2.89 करोड़ नामों के कटने की खबर ने न सिर्फ सियासी हलकों में हलचल मचाई है, बल्कि खुद भाजपा के भीतर गंभीर मतभेद और आरोप-प्रत्यारोप की स्थिति पैदा कर दी है।
एसआईआर ड्राफ्ट के मुताबिक यूपी में कुल मतदाताओं की संख्या करीब 12.55 करोड़ रह गई है, जबकि भाजपा का आंतरिक आकलन इसे लगभग 15.5 करोड़ मानकर चल रहा था। यानी करीब 19 फीसदी मतदाता अचानक सूची से बाहर हो गए। यह केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि उन सीटों और सामाजिक समूहों से जुड़ा मामला है, जिन पर सत्ता का संतुलन टिका रहता है।
सूत्रों के अनुसार, इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के बीच बंद कमरे में बैठकें हुईं। बैठक में सवाल उठा कि इतनी बड़ी संख्या में वोट कैसे कट गए। योगी खेमे की ओर से जिम्मेदारी बूथ लेवल एजेंट्स (बीएलए) पर डालने की कोशिश हुई, लेकिन पश्चिम यूपी के एक वरिष्ठ नेता ने पलटवार करते हुए कहा कि वोट जोड़ने-काटने की असली प्रक्रिया तो बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) के हाथ में होती है, जो राज्य सरकार के कर्मचारी हैं। इसी बिंदु पर अंदरूनी टकराव खुलकर सामने आ गया।
भाजपा के भीतर यह चिंता भी गहरी है कि कटे वोटरों में बड़ी संख्या यादव और मुस्लिम समुदाय से जुड़े मतदाताओं की बताई जा रही है। यही वह वर्ग है, जिसे पार्टी का परंपरागत विरोधी वोट बैंक माना जाता है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या एसआईआर की प्रक्रिया वास्तव में पूरी तरह निष्पक्ष रही या फिर इसके नतीजों ने सामाजिक संतुलन को प्रभावित किया है।
कटे वोटों की भरपाई के लिए पार्टी के भीतर एक नया दबाव तंत्र सक्रिय हो गया है। संगठन स्तर पर कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों को निर्देश दिए गए हैं कि प्रदेश के लगभग 1.77 लाख पोलिंग बूथों पर प्रति बूथ औसतन 200 नए वोटर जोड़े जाएं। अगर यह लक्ष्य हासिल होता है, तो एक महीने के भीतर करीब 3.5 करोड़ नए नाम मतदाता सूची में जोड़ने की योजना है। यही आदेश अब सबसे बड़ा विवाद बन गया है—क्योंकि सवाल उठ रहा है कि इतने कम समय में इतने बड़े पैमाने पर नए वोटर कहां से आएंगे।
आरोप यह भी है कि इस प्रक्रिया में डुप्लीकेसी को रणनीति के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। दिल्ली और अन्य राज्यों में रह रहे यूपी के लोगों को दोहरे पते पर वोटर बनाने की तैयारी की बात सामने आई है। तर्क दिया जा रहा है कि दूसरे राज्यों में तुरंत जांच नहीं होगी और तब तक यूपी का चुनाव निकल जाएगा। यह सोच चुनाव आयोग की प्रक्रिया और उसकी निगरानी क्षमता पर भी सवाल खड़े करती है।
ग्रामीण और शहरी वोटरों को लेकर भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है। हजारों ऐसे मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए हैं, जिन्होंने अपनी सुविधा के अनुसार गांव की बजाय शहर या शहर की बजाय गांव में नाम दर्ज कराया था। अब पार्टी चाहती है कि मतदाता का नाम वहीं रहे, जहां उसने पिछला चुनाव वोट डाला था—जिससे यह बहस और तेज हो गई है कि वोटर की सुविधा अहम है या पार्टी की चुनावी रणनीति।
ड्राफ्ट सूची का सबसे बड़ा असर शहरी विधानसभा क्षेत्रों में दिख रहा है। लखनऊ, गाजियाबाद, नोएडा, मेरठ, कानपुर और प्रयागराज जैसे शहरों में 25 से 30 फीसदी तक वोट कटने की बात सामने आई है। यही वे सीटें हैं, जहां भाजपा पिछले चुनावों में बेहद कम अंतर से जीती थी। आकलन है कि इन क्षेत्रों में पार्टी को एक-एक सीट पर एक लाख तक वोटों का नुकसान हो सकता है।
कुल मिलाकर, एसआईआर जिसे लोकतांत्रिक व्यवस्था को दुरुस्त करने की प्रक्रिया बताया जा रहा था, अब सत्ता के भीतर ही सबसे बड़ा सियासी सिरदर्द बन चुका है। सवाल अब विपक्ष नहीं, बल्कि खुद भाजपा के नेता उठा रहे हैं—क्या यह सुधार है या चुनावी गणित साधने की जल्दबाजी, और क्या इसकी कीमत लोकतंत्र को चुकानी पड़ेगी।
