अघोषित प्रेस सेंसरशिप के खिलाफ सपा नेता जीशान अंसारी का हल्लाबोल, जिला मुख्यालय पर सौंपी ‘प्रेस सेंसरशिप’ की प्रतीकात्मक ट्रॉफी
पत्रकारों की गिरफ्तारी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उठाए सवाल, जिलाधिकारी के माध्यम से केंद्र सरकार तक पहुंचाया विरोध; बोले सपा नेता— सवाल पूछना अपराध नहीं, लोकतंत्र की बुनियादी ताकत है

आरिफ़ अंसारी, वाराणसी
वाराणसी। देश में पत्रकारों की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति के अधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर उठ रहे सवालों के बीच समाजवादी पार्टी के नेता जीशान अंसारी के नेतृत्व में शुक्रवार को जिला मुख्यालय पर प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शन किया गया। इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने अघोषित प्रेस सेंसरशिप, पत्रकारों की गिरफ्तारियों और लोकतांत्रिक अधिकारों के कथित दमन के खिलाफ आवाज उठाई। विरोध दर्ज कराने के लिए जिलाधिकारी के माध्यम से भारत सरकार को ‘प्रेस सेंसरशिप’ की प्रतीकात्मक ट्रॉफी सौंपी गई।
प्रदर्शन के जरिए केंद्र सरकार के रवैये पर सवाल उठाते हुए नेताओं ने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए स्वतंत्र पत्रकारिता, निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया और असहमति के सम्मान को सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है। उनका कहना था कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य जनता की समस्याओं को सामने लाना, सत्ता से सवाल करना और शासन-प्रशासन को जवाबदेह बनाना है। ऐसे में पत्रकारों की गिरफ्तारी और उनकी आवाज दबाए जाने से जुड़ी खबरें लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं।
पत्रकारों की गिरफ्तारी को लेकर सपा नेता जीशान अंसारी ने जताई चिंता
सपा नेता जीशान अंसारी ने कहा कि दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों की गिरफ्तारी की खबरें बेहद चिंताजनक हैं। उन्होंने कहा कि पत्रकार लोकतंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक हैं। वे जनता और सरकार के बीच संवाद का माध्यम बनते हैं तथा जनहित से जुड़े मुद्दों को समाज के सामने लाते हैं।
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि पत्रकारों को सवाल पूछने, घटनाओं की रिपोर्टिंग करने और जनता के मुद्दों को उठाने के दौरान कार्रवाई का सामना करना पड़े, तो इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सरकारी व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है।
जीशान अंसारी ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार अघोषित प्रेस सेंसरशिप के जरिए मीडिया की आवाज कमजोर करने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि
लोकतंत्र में असहमति और आलोचना को दबाने के बजाय उनका जवाब तथ्यों, तर्कों और पारदर्शिता के साथ दिया जाना चाहिए।
उन्होंने पत्रकारों की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा को समय की जरूरत बताया।
शुभम सेठ बोले— सरकार को सवालों से नहीं, उनके जवाब देने से अपनी जवाबदेही साबित करनी चाहिए
प्रदर्शन के दौरान सपा नेता शुभम सेठ ने भी केंद्र सरकार के रवैये पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जिस सरकार को अपनी नीतियों पर भरोसा होता है, वह सवालों से नहीं डरती, बल्कि उनका जवाब देती है।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनता को सरकार से सवाल पूछने, नीतियों की आलोचना करने और स्वतंत्र मीडिया के माध्यम से सच्चाई जानने का अधिकार है। यदि सवाल पूछने को अपराध की तरह देखा जाने लगे और सच सामने लाने वाले पत्रकारों को गिरफ्तार किए जाने की स्थिति बने, तो लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर बहस जरूरी हो जाती है।
शुभम सेठ ने कहा कि सत्ता की मनमानी को लोकतंत्र के नाम पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करना लोकतांत्रिक व्यवस्था का अहम हिस्सा है और पत्रकारिता की स्वतंत्रता को कमजोर करने वाले किसी भी कदम पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर उठे सवाल, पारदर्शी जवाब की मांग
समाजवादी अधिवक्ता सभा के प्रदेश उपाध्यक्ष डॉ. आलोक सौरभ पाण्डेय ने निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता को लेकर उठ रहे सवालों पर पारदर्शी जवाब देने की मांग की। उन्होंने लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता के विश्वास को बनाए रखने के लिए जवाबदेही और स्पष्टता को महत्वपूर्ण बताया।
वहीं, अधिवक्ता अमरेंद्र पाण्डेय ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका को लेकर उठ रही चिंताओं और चुनावी प्रक्रिया से संबंधित बहस का समाधान सवाल उठाने वालों को दबाकर नहीं, बल्कि निष्पक्षता और जवाबदेही सुनिश्चित करके किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में नागरिकों को सवाल पूछने, शांतिपूर्ण विरोध करने और स्वतंत्र मीडिया के जरिए जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है। लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता तभी मजबूत होती है, जब उनके कामकाज को लेकर उठने वाले सवालों का उचित और पारदर्शी तरीके से जवाब दिया जाए।
अभिषेक झा बोले— देश संविधान से चलेगा, किसी की मनमानी से नहीं
अधिवक्ता अभिषेक झा ने कहा कि लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा स्वतंत्र पत्रकारिता का संरक्षण आवश्यक है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र किसी सरकार की जागीर नहीं है और पत्रकारिता को सत्ता के दबाव से मुक्त रहना चाहिए।
उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाओं और सच बोलने की आजादी का महत्व हमेशा बना रहता है। उन्होंने लोकतांत्रिक अधिकारों और पत्रकारों की स्वतंत्रता से किसी भी प्रकार का समझौता न करने की बात कही।
जनहित और लोकतांत्रिक अधिकारों के मुद्दे पर एकजुटता
प्रदर्शन के दौरान वक्ताओं ने कहा कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता केवल पत्रकारों का मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध आम नागरिकों के सूचना पाने के अधिकार से भी है। स्वतंत्र मीडिया जनता की समस्याओं को सामने लाने, सरकारी योजनाओं और नीतियों की समीक्षा करने तथा सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
प्रदर्शनकारियों ने मांग उठाई कि पत्रकारों की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े मामलों में पारदर्शिता बरती जाए तथा शांतिपूर्ण विरोध और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान सुनिश्चित किया जाए।
कार्यक्रम का संयोजन सपा नेता पुनीत मौर्य ने किया। इस दौरान शिवेंद्र राय, सिद्धार्थ सोनकर, इमरान खुर्शीद, विक्की गुप्ता, जीशान अंसारी, इमरान रज़ा, आरिफ खान, धीरू चौबे, फहद सिद्दीकी, प्रीतम यादव सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।




