
नीरज सिंह, वाराणसी
वाराणसी में गंगा नदी के बीच नाव पर बिरयानी खाने और कथित तौर पर हड्डी व गंदगी गंगा में फेंकने के आरोप में जेल भेजे गए पांच आरोपितों को आखिरकार राहत मिल गई है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय से जमानत मिलने के बाद सोमवार को जिला अदालत ने जमानतदार और बंधपत्र जमा होने पर सभी आरोपितों की रिहाई का आदेश जिला जेल प्रशासन को भेज दिया। अदालत में आरोपितों की ओर से अधिवक्ता विकास सिंह ने पक्ष रखा।
क्या था पूरा मामला
यह मामला उस समय चर्चा में आया था जब भारतीय जनता युवा मोर्चा वाराणसी महानगर के अध्यक्ष रजत जायसवाल ने कोतवाली थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि माँ गंगा करोड़ों सनातन धर्मावलंबियों की आस्था का केंद्र हैं और गंगा की धारा में नाव पर बैठकर इफ्तार के दौरान चिकन बिरयानी खाना तथा उसका अवशेष गंगा में फेंकना धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला कृत्य है।
एफआईआर में यह भी कहा गया था कि इस घटना से समाज में आक्रोश फैल गया और धार्मिक सौहार्द प्रभावित हुआ। हालांकि मामले में गंगा में गंदगी फेंकने का कोई प्रत्यक्ष वीडियो या स्पष्ट साक्ष्य सामने नहीं आया था। शिकायत मुख्य रूप से मीडिया में प्रसारित वीडियो और लिखित तहरीर के आधार पर दर्ज की गई थी।
पांच युवकों को किया गया था गिरफ्तार
कोतवाली पुलिस ने इस मामले में मोहम्मद आज़ाद अली, मोहम्मद तहसीम, निहाल अफरीदी, मोहम्मद तौसीफ अहमद और मोहम्मद अनस के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। जिला अदालत से जमानत अर्जी खारिज होने के बाद आरोपितों ने हाईकोर्ट का रुख किया।
हाईकोर्ट ने क्या कहा
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान कहा कि मामला इफ्तार पार्टी के आयोजन, वीडियो अपलोड करने और उसके जरिए धार्मिक सौहार्द बिगाड़ने के आरोपों से जुड़ा है, जिसकी जांच जारी रह सकती है। अदालत ने यह भी माना कि आरोपितों को लगातार जेल में रखे बिना भी जांच पूरी की जा सकती है।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि सभी आरोपित 17 मार्च 2026 से जेल में बंद हैं, उन्होंने अपने कृत्य पर खेद व्यक्त किया है और भविष्य में ऐसी गतिविधि दोबारा न करने का आश्वासन दिया है। इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने उन्हें जमानत पर रिहा करना उचित माना।
एकतरफा कार्रवाई को लेकर उठ रहे सवाल
मामले में अब सामाजिक और राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है। कुछ लोगों का कहना है कि यह कार्रवाई धर्म विशेष से जुड़े होने के कारण अधिक कठोर हुई। उनका तर्क है कि गंगा में गंदगी फेंकने का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं होने के बावजूद युवकों को लगभग दो महीने तक जेल में रखा गया।
वहीं कई लोग हाल के उन मामलों का भी हवाला दे रहे हैं, जिनमें गंगा नदी में नाव पर शराब पार्टी, तेज डीजे और अशोभनीय गतिविधियों के आरोप सामने आए थे, लेकिन पुलिस द्वारा वैसी सख्त कार्रवाई नहीं की गई। ऐसे में इस पूरे प्रकरण को लेकर कानून के समान अनुपालन और निष्पक्षता पर भी सवाल उठने लगे हैं।
धार्मिक आस्था और कानून के बीच संतुलन की चुनौती
यह मामला एक बार फिर धार्मिक आस्था, सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो, कानून व्यवस्था और पुलिस कार्रवाई के संतुलन को लेकर चर्चा का विषय बन गया है। प्रशासन की ओर से फिलहाल मामले की जांच जारी रहने की बात कही जा रही है।



