कलम और संघर्ष पर पहरा: नोएडा में वैचारिक दमन की नई लहर
NSA के घेरे में वरिष्ठ पत्रकार और छात्र: लोकतांत्रिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की आजादी पर गहराता संकट!

रिपोर्ट: वीरेन्द्र पटेल, संवाददाता वाराणसी।
वाराणसी। उत्तर प्रदेश के औद्योगिक केंद्र नोएडा में मजदूरों के हक की आवाज उठाना अब एक संगीन जुर्म बनता जा रहा है। शासन और प्रशासन द्वारा आंदोलन को कुचलने की कोशिशें अब सीधे तौर पर बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को निशाना बना रही हैं। कल यानी 13 मई को पुलिस ने एक बेहद चौंकाने वाला कदम उठाते हुए वरिष्ठ पत्रकार सत्यम वर्मा और छात्र कार्यकर्ता आकृति चौधरी पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) यानी ‘रसूका’ तामील कर दिया है।
सत्यम वर्मा: तीन दशक की निष्पक्ष पत्रकारिता अब पुलिस की फाइलों में ‘साजिश’
वरिष्ठ पत्रकार सत्यम वर्मा, जिन्होंने तीन दशकों तक ‘यूनीवार्ता’ जैसी प्रतिष्ठित एजेंसी में अपनी सेवाएं दीं, आज सलाखों के पीछे हैं। विडंबना यह है कि जिस व्यक्ति ने अपना जीवन शहीद-ए-आजम भगत सिंह के संपूर्ण लेखन को संकलित करने और जनचेतना जगाने में लगा दिया, पुलिस उन्हें एक ‘साजिशकर्ता’ के रूप में पेश कर रही है। पुलिस का दावा है कि वे नोएडा में मौजूद रहकर हिंसा भड़का रहे थे, जबकि हकीकत यह है कि वे पिछले 12 सालों से नोएडा ही नहीं गए। उनकी गिरफ्तारी को अभिव्यक्ति की आजादी पर सीधा हमला माना जा रहा है।
आकृति चौधरी और युवा नेतृत्व: सलाखों के पीछे दबती नई आवाजें
दिल्ली विश्वविद्यालय की मेधावी छात्रा आकृति चौधरी, जो पीएचडी की तैयारी कर रही थीं, अब एक साल तक जेल में बिताने के खतरे का सामना कर रही हैं। उन्हें 11 अप्रैल को सादे कपड़ों में आए पुलिसकर्मियों ने बॉटनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन से उठाया था। आकृति के अलावा, सॉफ्टवेयर इंजीनियर आदित्य आनंद, ऑटो चालक रूपेश रॉय और सामाजिक कार्यकर्ता मनीषा चौहान व सृष्टि गुप्ता जैसे युवाओं को भी इस मामले में घसीटा गया है। इन युवाओं का ‘कसूर’ सिर्फ इतना था कि वे हाशिए पर खड़े मजदूरों की जायज मांगों के साथ खड़े हुए।
जेल के भीतर गूंजते प्रतिरोध के स्वर: हार मानने को तैयार नहीं कार्यकर्ता
प्रशासन की तमाम सख्ती और टॉर्चर की खबरों के बावजूद, जेल में बंद इन कार्यकर्ताओं के हौसले पस्त नहीं हुए हैं। सूत्रों के अनुसार, जेल के भीतर ही ‘मजदूर दिवस’ के अवसर पर गीत गाए गए और कविता पाठ के जरिए अपना विरोध दर्ज कराया गया। ‘दिशा छात्र संगठन’ और ‘जागरूक नागरिक मंच’ ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक सत्यम वर्मा, आकृति और अन्य सभी की बिना शर्त रिहाई नहीं होती और NSA जैसे काले कानून वापस नहीं लिए जाते, यह संघर्ष जारी रहेगा।




